मुंगेली – नगर सहित आस पास के ग्रामीण क्षेत्रो में इन दिनों ब्याजखोरी का गोरख धंधा जोर शोर से चल रहा हैं जिसमे कुछ सफेदपोश नेताओं के साथ साथ ऊंचे रसूख मेँ बैठे लोग अपने पैसो का माया जाल फैलते जा रहे है। सूत्रों के अनुसार शहर और आसपास के क्षेत्रों में सक्रिय कुछ स्थानीय नेताओं सहित एवं बाहरी लोगों ने जरूरतमंदों की मजबूरी को कमाई का जरिया बना लिया है। छोटे व्यापारी, ठेला-रेहड़ी संचालक, दिहाड़ी मजदूर और आर्थिक संकट से जूझ रहे परिवार सबसे अधिक इस जाल में फंस रहे हैं। बताया जा रहा है कि बैंक या वित्तीय संस्थानों से तत्काल ऋण नहीं मिलने का फायदा उठाकर ये लोग बिना किसी वैधानिक अनुमति के नकद राशि उपलब्ध कराते हैं और बाद में रोजाना वसूली के नाम पर भारी रकम वसूलते हैं।
सूत्रों का दावा है कि इन दिनों सबसे अधिक चलन “रोजाना कलेक्शन” वाली व्यवस्था का है। इसके तहत किसी जरूरतमंद व्यक्ति को ₹10,000 दिए जाते हैं, लेकिन बदले में उससे प्रतिदिन ₹120 की वसूली की जाती है। यह सिलसिला लगातार 100 दिनों तक चलता है। इस तरह उधार लेने वाला व्यक्ति कुल ₹12,000 चुका देता है। यानी महज लगभग तीन माह में ₹2,000 अतिरिक्त राशि वसूल ली जाती है। पहली नजर में प्रतिदिन ₹120 की राशि छोटी दिखाई देती है, लेकिन जिन लोगों की आय रोज की दिहाड़ी या छोटी-मोटी बिक्री पर निर्भर है, उनके लिए यह रकम हर दिन चुकाना आसान नहीं होता।
जानकारी के अनुसार कई बार ऐसा भी होता है कि किसी दिन मजदूरी नहीं मिलती या दुकान पर पर्याप्त बिक्री नहीं होती। ऐसी स्थिति में दैनिक किस्त जमा नहीं हो पाती। इसके बाद वसूली करने वाले लोगों का दबाव बढ़ने लगता है। मजबूरी में पीड़ित व्यक्ति किसी दूसरे साहूकार से पैसा लेकर पहली किस्त चुकाता है और धीरे-धीरे एक ब्याज चुकाने के लिए दूसरा कर्ज लेने की स्थिति में पहुंच जाता है। यही सिलसिला उसे कर्ज के ऐसे चक्रव्यूह में धकेल देता है, जहां से निकलना बेहद कठिन हो जाता है।
बताया जाता है कि इस अवैध कारोबार का सबसे अधिक असर गरीब और निम्न आय वर्ग पर पड़ रहा है। कई छोटे कारोबारी अपनी दैनिक आय का बड़ा हिस्सा किस्त चुकाने में खर्च कर देते हैं, जिससे परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो जाता है। कुछ लोगों के सामने दुकान बंद करने, कारोबार समेटने अथवा दूसरे शहरों की ओर पलायन करने जैसी नौबत भी आने लगी है। सामाजिक प्रतिष्ठा बचाने और लगातार हो रही वसूली से बचने के लिए कई पीड़ित अपनी परेशानी खुलकर सामने भी नहीं ला पाते।
शहर में चर्चा है कि यदि समय रहते इस तरह की अवैध गतिविधियों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई तो इसका दायरा और बढ़ सकता है। सामाजिक संगठनों का भी मानना है कि जरूरतमंद लोगों को वैध बैंकिंग व्यवस्था और सरकारी योजनाओं के माध्यम से आसानी से ऋण उपलब्ध कराया जाए, ताकि वे सूदखोरों के जाल में न फंसें।
नागरिकों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि बिना वैधानिक अनुमति के इस प्रकार का नेटवर्क संचालित हो रहा है तो इसकी निगरानी और रोकथाम के लिए संबंधित एजेंसियों द्वारा क्या कदम उठाए जा रहे हैं। मुंगेली के लोगों की नजर अब इस बात पर टिकी है कि प्रशासन इस गंभीर मुद्दे पर क्या कदम उठाता है?

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