सम्पादकी :-
लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ कहा जाता है। कभी इस स्तंभ की पहचान सवालों से हुआ करती थी, अब लगता है कुछ जगहों पर इसकी नई परिभाषा बन रही है—जहां सवाल कम और मुस्कान ज्यादा जरूरी है।
आजकल पत्रकारिता में एक नया चलन देखने को मिल रहा है। खबर चाहे छोटी हो या बड़ी, लेकिन उसमें किसी बड़े साहब, नेता या प्रभावशाली व्यक्ति का नाम और तस्वीर जरूर होनी चाहिए। आखिर खबर पढ़ने वाले को यह कैसे पता चलेगा कि पत्रकारिता के अच्छे संबंध भी हैं!
कुछ कलमें ऐसी भी हैं जो खबर लिखने से पहले शायद यह हिसाब लगा लेती हैं कि किस खबर से कितने लोग खुश होंगे। जनहित के सवालों पर कलम थोड़ी संकोची हो जाती है, लेकिन स्वागत, सम्मान और अभिनंदन के समाचार आते ही शब्दों में अचानक ऊर्जा आ जाती है। लगता है जैसे स्याही भी अवसर देखकर प्रवाहित होती है।
पहले पत्रकार अधिकारी और नेताओं से सवाल पूछते थे, अब कुछ पत्रकारों का सवाल होता है—“सर, फोटो अच्छी आई है न?”
हालांकि यह बदलाव पूरी पत्रकारिता का प्रतिनिधित्व नहीं करता। आज भी ऐसे पत्रकार हैं जो बिना किसी पद, पुरस्कार या कृपा की उम्मीद के अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। वे जानते हैं कि पत्रकारिता किसी व्यक्ति की प्रशंसा पुस्तिका नहीं, बल्कि समाज का आईना है।
समस्या तब पैदा होती है जब आईना दिखाने वाले ही चेहरे देखकर आईने की दिशा तय करने लगें। फिर जनता को वास्तविक तस्वीर दिखाई देगी या वही, जो दिखाना सुविधाजनक है—यह सवाल जरूर खड़ा होता है।
पत्रकारिता में संबंध होना गलत नहीं, लेकिन संबंधों के कारण खबर का रंग बदल जाना जरूर चिंता की बात है। आखिर चौथा स्तंभ भी अगर तालियों की आवाज में अपनी आवाज भूल जाए, तो लोकतंत्र को सवाल कौन पूछेगा?
इसलिए पत्रकारिता को बस इतना याद रखना चाहिए—कलम की स्याही भले ही सस्ती हो, लेकिन उसकी विश्वसनीयता बेहद कीमती है।

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