पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है। यह केवल खबरों का माध्यम नहीं, बल्कि समाज का दर्पण और जनभावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त मंच है। एक सशक्त और निष्पक्ष पत्रकारिता ही शासन-प्रशासन को जवाबदेह बनाती है तथा आम नागरिकों की आवाज को व्यवस्था तक पहुँचाती है। किंतु विगत कुछ वर्षों में इस पवित्र पेशे की साख पर कुछ तथाकथित पत्रकारों के आचरण ने प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। विशेषकर त्यौहारों, राष्ट्रीय पर्वों—जैसे 26 जनवरी और 15 अगस्त—के आसपास एक अलग ही प्रवृत्ति देखने को मिलती है।
मुंगेली सहित अनेक स्थानों पर यह शिकायत आम होती जा रही है कि कुछ लोग स्वयं को पत्रकार बताकर जनप्रतिनिधियो, सरपंच,सचिव,शासकीय कार्यालयों, अस्पतालों, राइस मिलों तथा अन्य प्रतिष्ठानों में पहुँच जाते हैं और “विज्ञापन” के नाम पर चंदा वसूली शुरू कर देते हैं। विज्ञापन देना या न देना किसी भी संस्था का स्वैच्छिक निर्णय होना चाहिए, किंतु जब इसे दबाव, भय या ब्लैकमेलिंग के माध्यम से वसूला जाने लगे, तब यह पत्रकारिता नहीं बल्कि पेशे की आड़ में की जा रही अनुचित गतिविधि बन जाती है।
और भी चिंताजनक तब हो जाता है जब चंदा न देने की स्थिति में संबंधित अधिकारियों या व्यवसायियों, जनपनिधियों, सरपंच, सचिव, के फोटो-वीडियो बनाकर उन्हें समाचार प्रकाशित करने की धमकी दी जाती है। छवि खराब करने या नकारात्मक खबर छापने का भय दिखाकर आर्थिक लाभ लेने की प्रवृत्ति न केवल कानूनन अपराध है, बल्कि यह पूरे पत्रकार समुदाय की प्रतिष्ठा को आघात पहुँचाती है। कुछ लोगों के इस कृत्य से उन ईमानदार और निष्ठावान पत्रकारों की छवि भी धूमिल होती है, जो सीमित संसाधनों में निष्पक्षता और साहस के साथ अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हैं।
समाज को यह समझना होगा कि पत्रकारिता और उगाही दो अलग बातें हैं। पत्रकारिता का उद्देश्य जनहित, पारदर्शिता और सत्य का प्रसार है, न कि व्यक्तिगत लाभ। यदि इस प्रकार की गतिविधियों पर समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया, तो जनता का चौथे स्तम्भ पर से विश्वास डगमगा सकता है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह विश्वास अत्यंत आवश्यक है।
प्रशासनिक अधिकारियों को भी इस विषय को गंभीरता से लेना चाहिए। यदि किसी के द्वारा दबाव बनाकर धन की मांग की जाती है, तो उसकी विधिवत शिकायत दर्ज होनी चाहिए और जांच कर उचित कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही पत्रकार संगठनों को भी आत्ममंथन करते हुए अपने स्तर पर आचार संहिता को सख्ती से लागू करना चाहिए, ताकि पेशे की गरिमा बनी रहे।
अंततः आवश्यकता इस बात की है कि पत्रकारिता को व्यवसाय से अधिक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाए। कलम की ताकत तभी सार्थक है जब वह निष्पक्ष, निर्भीक और नैतिक मूल्यों पर आधारित हो। कुछ तथाकथित लोगों के कारण यदि पूरी बिरादरी बदनाम होती है, तो यह समाज और लोकतंत्र दोनों के लिए हानिकारक है। समय की मांग है कि ऐसे कृत्यों पर लगाम लगे और चौथे स्तम्भ की विश्वसनीयता अक्षुण्ण बनी रहे।

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