मुंगेली – सरकारी योजनाओं के दम पर संवेदनशील शासन और पारदर्शी व्यवस्था के दावों के बीच मुंगेली जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विडंबना देखिए कि जिस महिला की सांसें चल रही हैं, जो अपने पैरों पर चलकर अधिकारियों के सामने पहुंची, उसी को सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित कर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि उसकी महतारी वंदन योजना की राशि बंद हो गई और अब वह खुद को जिंदा साबित करने के लिए सरकारी दफ्तरों की चौखट नापने को मजबूर है।
मामला मुंगेली विकासखंड के ग्राम पंचायत बलौदी के आश्रित ग्राम गीतपूरी का है। यहां की निवासी भूरी बाई यादव को जनवरी 2026 के बाद से महतारी वंदन योजना की राशि मिलनी बंद हो गई। जब उन्होंने कारण जानने की कोशिश की तो गांव के एक कियोस्क एजेंट ने ऐसा जवाब दिया, जिसे सुनकर कोई भी सन्न रह जाए। एजेंट ने कहा, “तुम तो भगवान के घर चली गई हो, इसलिए पैसा नहीं आया।”
भूरी बाई और उनके परिवार को तब पता चला कि सरकारी रिकॉर्ड में उन्हें 1 फरवरी 2026 से मृत घोषित कर दिया गया है। यानी कागजों में उनकी मौत हो चुकी थी, बस उन्हें खुद इसकी जानकारी नहीं थी।
सरकारी फाइलों की दुनिया भी बड़ी निराली है। यहां कभी जिंदा लोग मर जाते हैं तो कभी मृतक वर्षों तक योजनाओं का लाभ उठाते रहते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि गलती का खामियाजा हमेशा आम आदमी को ही भुगतना पड़ता है। भूरी बाई के सामने भी यही स्थिति है। योजना की राशि बंद होने से आर्थिक संकट खड़ा हो गया और अब उन्हें अपने बेटे गुनुराम यादव के साथ कलेक्टर जनदर्शन पहुंचकर आधार कार्ड और अन्य दस्तावेजों के सहारे यह साबित करना पड़ रहा है कि वह वास्तव में जीवित हैं।
प्रशासन का कहना है कि गांव में इसी नाम की दूसरी महिला की मृत्यु होने के कारण तकनीकी या मानवीय त्रुटि से यह गड़बड़ी हुई। हालांकि भूरी बाई के बेटे ने इस दावे पर सवाल उठाते हुए कहा है कि उनकी जानकारी में गांव में किसी भी भूरी बाई की मृत्यु नहीं हुई है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर मौत का प्रमाण किसके नाम पर दर्ज किया गया और किस आधार पर उनकी मां को लाभार्थी सूची से बाहर कर दिया गया?
यह घटना सिर्फ एक महिला की परेशानी नहीं, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड और योजनाओं की विश्वसनीयता पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। सवाल यह भी है कि यदि एक जीवित महिला को मृत घोषित किया जा सकता है, तो फिर आम नागरिक अपने अधिकारों को लेकर कितना सुरक्षित है?
फिलहाल प्रशासन ने त्रुटि सुधारने और दोबारा योजना का लाभ दिलाने का आश्वासन दिया है। लेकिन बड़ा सवाल अभी भी कायम है—क्या सिर्फ गलती सुधार देना ही काफी है, या फिर उन जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही भी तय होगी जिनकी एक चूक ने एक जीवित महिला को सरकारी कागजों में मृत बना दिया?

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