
मुंगेली – संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना के लिए मनाया जाने वाला पारंपरिक हलषष्ठी व्रत (हरछठ/कमरछठ) बुधवार को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया गया। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि पर मनाए जाने वाले इस पर्व को भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम से भी जोड़ा जाता है। इस अवसर पर माताओं ने अपनी परंपरा के अनुसार व्रत रखकर हलषष्ठी माता की पूजा-अर्चना की और संतान के सुखद एवं स्वस्थ जीवन की कामना की।

हलषष्ठी पर्व को लेकर शहर के बाजारों में भी विशेष रौनक देखने को मिली। पूजा के लिए महिलाओं ने महुआ, पसई/पसहर चावल, ज्वार की धानी, मिट्टी के बर्तन और विभिन्न प्रकार की भाजियां खरीदीं। छत्तीसगढ़ की कमरछठ परंपरा में छह प्रकार की भाजी का विशेष महत्व माना जाता है। क्षेत्रीय मान्यता के अनुसार चरोटा, खट्टा, चेंच, मुनगा, कुम्हड़ा, लाल भाजी और चौलाई जैसी मौसमी भाजियों का उपयोग पूजा में किया गया।
पर्व पर कई स्थानों पर छह प्रकार की सामग्री, अन्न, वस्त्र और अन्य पूजन सामग्री का भी उपयोग किया गया। पारंपरिक मान्यता के अनुसार इस दिन हल से जुते खेत की उपज से परहेज किया जाता है तथा पसई/पसही चावल, महुआ और जलाशयों में उगने वाली वस्तुओं का उपयोग किया जाता है। कई परंपराओं में गाय के दूध-दही के बजाय भैंस के दूध, दही और घी का प्रयोग भी किया जाता है।
महिलाओं ने पूजा के बाद हलषष्ठी माता की कथा सुनी और संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य एवं उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रार्थना की।

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